September 12, 2026

Vikash Jaiswal

“आंगनबाड़ी में ताला, खबर बनी हथौड़ा… 4 केंद्रों के 8 कर्मचारियों पर गिरी गाज, परियोजना अधिकारी ने...
राजस्थान से सकुशल लौटे रामदास महंत ने एसएसपी श्री शशि मोहन सिंह से की सौजन्य भेंट *9 जुलाई, रायगढ़* । लगभग 100 दिनों बाद सकुशल अपने घर लौटे ग्राम पुटकापुरी, पुसौर निवासी रामदास महंत ने आज वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री शशि मोहन सिंह से सौजन्य भेंट की। इस दौरान एसएसपी ने रामदास से आत्मीयता के साथ बातचीत कर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली तथा उन्हें नियमित रूप से घर पर रहकर स्वास्थ्य का ध्यान रखने की सलाह दी। उन्होंने किसी भी प्रकार की आवश्यकता या परेशानी होने पर बिना संकोच पुलिस एवं प्रशासन से संपर्क करने का भरोसा भी दिलाया। इस दौरान नगर पुलिस अधीक्षक श्री मयंक मिश्रा एवं थाना प्रभारी पुसौर निरीक्षक हर्षवर्धन सिंह बैस भी उपस्थिति थे । एसएसपी श्री शशि मोहन सिंह ने थाना प्रभारी को निर्देशित किया कि समय-समय पर रामदास महंत एवं उनके परिवार से मुलाकात कर उनका कुशलक्षेम जानें तथा आवश्यकता पड़ने पर हरसंभव सहयोग उपलब्ध कराएं। उल्लेखनीय है कि ग्राम पुटकापुरी, विकासखंड पुसौर निवासी रामदास महंत मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के कारण लगभग 100 दिन पूर्व घर से कहीं चले गए थे। परिजनों एवं ग्रामीणों द्वारा लगातार खोजबीन के बावजूद उनका कोई पता नहीं चल सका। इसी दौरान सोशल मीडिया के माध्यम से उनके राजस्थान के सिरोही जिले में होने की सूचना प्राप्त हुई।

राजस्थान से सकुशल लौटे रामदास महंत ने एसएसपी श्री शशि मोहन सिंह से की सौजन्य भेंट *9 जुलाई, रायगढ़* । लगभग 100 दिनों बाद सकुशल अपने घर लौटे ग्राम पुटकापुरी, पुसौर निवासी रामदास महंत ने आज वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री शशि मोहन सिंह से सौजन्य भेंट की। इस दौरान एसएसपी ने रामदास से आत्मीयता के साथ बातचीत कर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली तथा उन्हें नियमित रूप से घर पर रहकर स्वास्थ्य का ध्यान रखने की सलाह दी। उन्होंने किसी भी प्रकार की आवश्यकता या परेशानी होने पर बिना संकोच पुलिस एवं प्रशासन से संपर्क करने का भरोसा भी दिलाया। इस दौरान नगर पुलिस अधीक्षक श्री मयंक मिश्रा एवं थाना प्रभारी पुसौर निरीक्षक हर्षवर्धन सिंह बैस भी उपस्थिति थे । एसएसपी श्री शशि मोहन सिंह ने थाना प्रभारी को निर्देशित किया कि समय-समय पर रामदास महंत एवं उनके परिवार से मुलाकात कर उनका कुशलक्षेम जानें तथा आवश्यकता पड़ने पर हरसंभव सहयोग उपलब्ध कराएं। उल्लेखनीय है कि ग्राम पुटकापुरी, विकासखंड पुसौर निवासी रामदास महंत मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के कारण लगभग 100 दिन पूर्व घर से कहीं चले गए थे। परिजनों एवं ग्रामीणों द्वारा लगातार खोजबीन के बावजूद उनका कोई पता नहीं चल सका। इसी दौरान सोशल मीडिया के माध्यम से उनके राजस्थान के सिरोही जिले में होने की सूचना प्राप्त हुई।

सूचना मिलते ही कलेक्टर श्री मयंक चतुर्वेदी एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री शशि मोहन सिंह के निर्देशन...
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मौत के मुहाने से लौटे पाँच मासूम: रायगढ़ मेडिकल कॉलेज ने विषैले सर्पदंश के गंभीर मामलों में बचाई बच्चों की जानतीन बच्चों को वेंटिलेटर पर रखकर किया गया उपचार, सभी स्वस्थ होकर घर लौटेरायगढ़, 8 जुलाई 2026/ श्री लखीराम अग्रवाल स्मृति शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं संबद्ध संत बाबा गुरु घासीदास जी स्मृति चिकित्सालय रायगढ़ ने विषैले सर्पदंश से जूझ रहे पाँच गंभीर बच्चों का सफल उपचार कर उन्हें नया जीवन दिया है। अत्यंत नाजुक स्थिति में अस्पताल पहुंचे इन बच्चों में से तीन को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा, जबकि गंभीर मामलों में 50 वायल तक एंटी-स्नेक वेनम (एएसवी) का उपयोग किया गया। विशेषज्ञ चिकित्सकीय देखरेख, आधुनिक पीआईसीयू सुविधाओं और सतत उपचार के परिणामस्वरूप सभी बच्चे पूरी तरह स्वस्थ होकर चिकित्सालय से डिस्चार्ज किए गए।बाल्य एवं शिशु रोग विभाग तथा पीआईसीयू में भर्ती पाँचों बच्चों में चार न्यूरोटॉक्सिक तथा एक हेमोटॉक्सिक सर्पदंश का मामला था। इनमें तीन करैत, एक कोबरा और एक वाइपर के दंश से पीड़ित थे। सभी को गंभीर अवस्था में अस्पताल लाया गया था, जहाँ तत्काल आपातकालीन उपचार शुरू किया गया। सबसे संवेदनशील मामला धरमजयगढ़ के दो सगे भाइयों 7 वर्षीय वीर कुमार और 12 वर्षीय लोकेश राठिया का था। एक जुलाई की रात सोते समय दोनों को करैत ने गर्दन पर काट लिया। सुबह तक दोनों में गंभीर न्यूरोपैरालिटिक विषाक्तता विकसित हो चुकी थी और उनकी स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई थी।इसी प्रकार सक्ती जिले के हसौद निवासी 7 वर्षीय मंजू को कोबरा ने पैर में काट लिया था, जिससे पैर में गंभीर सूजन और फफोले बन गए। वहीं रायगढ़ के 5 वर्षीय हितेश ढंगर को वाइपर के दंश से रक्तस्राव और रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो गई थी। कलमी निवासी 7 वर्षीय हर्षित प्रजापति को भी सोते समय करैत ने काट लिया था, जिससे उसे गंभीर न्यूरोटॉक्सिक विषाक्तता हो गई। अस्पताल पहुंचने पर अधिकांश बच्चों में पलकें झुकना, बोलने और निगलने में कठिनाई, मांसपेशियों में कमजोरी तथा श्वसन विफलता जैसे गंभीर लक्षण दिखाई दे रहे थे। तीन बच्चों को तत्काल पीआईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। वाइपर दंश से पीड़ित बालक में रक्तस्राव एवं कोगुलोपैथी की स्थिति को विशेषज्ञ निगरानी में नियंत्रित किया गया। सभी मरीजों को आवश्यकता अनुसार 50 वायल तक एंटी-स्नेक वेनम, आधुनिक गहन चिकित्सा, निरंतर मॉनिटरिंग और आवश्यक जांचों के साथ चैबीसों घंटे उपचार उपलब्ध कराया गया। अस्पताल अधीक्षक डॉ. दुर्गा शंकर पटेल ने बताया कि विषैले सर्पदंश जैसे गंभीर मामलों में समय पर एंटी-वेनम, वेंटिलेटर सुविधा और प्रशिक्षित चिकित्सकीय टीम की उपलब्धता से पाँचों बच्चों की जान बचाई जा सकी। उन्होंने बताया कि सभी उपचार एवं आवश्यक दवाएं आयुष्मान योजना के अंतर्गत पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध कराई गईं।अधिष्ठाता डॉ. संतोष कुमार ने कहा कि समय पर उपचार और समर्पित चिकित्सकीय प्रयासों से विषैले सर्पदंश जैसे जीवन-घातक मामलों में भी बच्चों को सुरक्षित नया जीवन दिया जा सकता है। बाल्य एवं शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. लक्ष्मणेश्वर कुमार सोनी के नेतृत्व में सहायक प्राध्यापक डॉ. गौरव क्लॉडियस, डॉ. फारूज अहमद, डॉ. पल्लवी सहित पीआईसीयू के चिकित्सकों एवं नर्सिंग स्टाफ ने चैबीसों घंटे सतत निगरानी, वेंटिलेटर प्रबंधन और समन्वित उपचार के माध्यम से इस चुनौतीपूर्ण चिकित्सकीय सफलता को संभव बनाया। 1233021298230597060467693

मौत के मुहाने से लौटे पाँच मासूम: रायगढ़ मेडिकल कॉलेज ने विषैले सर्पदंश के गंभीर मामलों में बचाई बच्चों की जानतीन बच्चों को वेंटिलेटर पर रखकर किया गया उपचार, सभी स्वस्थ होकर घर लौटेरायगढ़, 8 जुलाई 2026/ श्री लखीराम अग्रवाल स्मृति शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं संबद्ध संत बाबा गुरु घासीदास जी स्मृति चिकित्सालय रायगढ़ ने विषैले सर्पदंश से जूझ रहे पाँच गंभीर बच्चों का सफल उपचार कर उन्हें नया जीवन दिया है। अत्यंत नाजुक स्थिति में अस्पताल पहुंचे इन बच्चों में से तीन को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा, जबकि गंभीर मामलों में 50 वायल तक एंटी-स्नेक वेनम (एएसवी) का उपयोग किया गया। विशेषज्ञ चिकित्सकीय देखरेख, आधुनिक पीआईसीयू सुविधाओं और सतत उपचार के परिणामस्वरूप सभी बच्चे पूरी तरह स्वस्थ होकर चिकित्सालय से डिस्चार्ज किए गए।बाल्य एवं शिशु रोग विभाग तथा पीआईसीयू में भर्ती पाँचों बच्चों में चार न्यूरोटॉक्सिक तथा एक हेमोटॉक्सिक सर्पदंश का मामला था। इनमें तीन करैत, एक कोबरा और एक वाइपर के दंश से पीड़ित थे। सभी को गंभीर अवस्था में अस्पताल लाया गया था, जहाँ तत्काल आपातकालीन उपचार शुरू किया गया। सबसे संवेदनशील मामला धरमजयगढ़ के दो सगे भाइयों 7 वर्षीय वीर कुमार और 12 वर्षीय लोकेश राठिया का था। एक जुलाई की रात सोते समय दोनों को करैत ने गर्दन पर काट लिया। सुबह तक दोनों में गंभीर न्यूरोपैरालिटिक विषाक्तता विकसित हो चुकी थी और उनकी स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई थी।इसी प्रकार सक्ती जिले के हसौद निवासी 7 वर्षीय मंजू को कोबरा ने पैर में काट लिया था, जिससे पैर में गंभीर सूजन और फफोले बन गए। वहीं रायगढ़ के 5 वर्षीय हितेश ढंगर को वाइपर के दंश से रक्तस्राव और रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो गई थी। कलमी निवासी 7 वर्षीय हर्षित प्रजापति को भी सोते समय करैत ने काट लिया था, जिससे उसे गंभीर न्यूरोटॉक्सिक विषाक्तता हो गई। अस्पताल पहुंचने पर अधिकांश बच्चों में पलकें झुकना, बोलने और निगलने में कठिनाई, मांसपेशियों में कमजोरी तथा श्वसन विफलता जैसे गंभीर लक्षण दिखाई दे रहे थे। तीन बच्चों को तत्काल पीआईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। वाइपर दंश से पीड़ित बालक में रक्तस्राव एवं कोगुलोपैथी की स्थिति को विशेषज्ञ निगरानी में नियंत्रित किया गया। सभी मरीजों को आवश्यकता अनुसार 50 वायल तक एंटी-स्नेक वेनम, आधुनिक गहन चिकित्सा, निरंतर मॉनिटरिंग और आवश्यक जांचों के साथ चैबीसों घंटे उपचार उपलब्ध कराया गया। अस्पताल अधीक्षक डॉ. दुर्गा शंकर पटेल ने बताया कि विषैले सर्पदंश जैसे गंभीर मामलों में समय पर एंटी-वेनम, वेंटिलेटर सुविधा और प्रशिक्षित चिकित्सकीय टीम की उपलब्धता से पाँचों बच्चों की जान बचाई जा सकी। उन्होंने बताया कि सभी उपचार एवं आवश्यक दवाएं आयुष्मान योजना के अंतर्गत पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध कराई गईं।अधिष्ठाता डॉ. संतोष कुमार ने कहा कि समय पर उपचार और समर्पित चिकित्सकीय प्रयासों से विषैले सर्पदंश जैसे जीवन-घातक मामलों में भी बच्चों को सुरक्षित नया जीवन दिया जा सकता है। बाल्य एवं शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. लक्ष्मणेश्वर कुमार सोनी के नेतृत्व में सहायक प्राध्यापक डॉ. गौरव क्लॉडियस, डॉ. फारूज अहमद, डॉ. पल्लवी सहित पीआईसीयू के चिकित्सकों एवं नर्सिंग स्टाफ ने चैबीसों घंटे सतत निगरानी, वेंटिलेटर प्रबंधन और समन्वित उपचार के माध्यम से इस चुनौतीपूर्ण चिकित्सकीय सफलता को संभव बनाया।

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हरी खाद से खेत होंगे उपजाऊ, बढे़गी पैदावार और घटेगी खेती की लागतकृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, रायगढ़ के वैज्ञानिकों ने किसानों को दी प्राकृतिक पोषण प्रबंधन अपनाने की सलाहरायगढ़, 8 जुलाई 2026/ कृषि की बढ़ती लागत और मृदा की घटती उर्वरता के बीच हरी खाद किसानों के लिए एक प्रभावी, प्राकृतिक और किफायती विकल्प बनकर उभर रही है। कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, रायगढ़ के प्राध्यापकों एवं वैज्ञानिकों ने किसानों से हरी खाद एवं हरी पत्तियों की खाद का अधिकाधिक उपयोग करने की अपील करते हुए बताया कि इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है तथा फसलों की उत्पादकता और गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होता है। वैज्ञानिकों ने बताया कि हरी खाद के लिए ढैंचा, सनई, मूंग, उड़द, लोबिया एवं ग्वार जैसी दलहनी फसलें बोई जाती हैं। इन फसलों को बुवाई के लगभग 35 से 45 दिन बाद, फूल आने से पहले रोटावेटर अथवा कल्टीवेटर की सहायता से खेत में ही मिट्टी में मिला दिया जाता है। कुछ दिनों में यह सड़कर जैविक खाद का रूप ले लेती हैं, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन, कार्बनिक पदार्थ तथा अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है।इसी प्रकार हरी पत्तियों की खाद के लिए नीम, करंज, ग्लिरिसिडिया एवं सहजन जैसे वृक्षों की कोमल पत्तियों और टहनियों को खेत में मिलाया जाता है। इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता में सुधार होने के साथ लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता भी बढ़ती है। वैज्ञानिकों के अनुसार हरी खाद से प्रति हेक्टेयर लगभग 50 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन की पूर्ति होती है। इससे मिट्टी की संरचना मजबूत होती है, जल धारण क्षमता बढ़ती है, भूमि का कटाव कम होता है तथा पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है। रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होने से खेती की लागत घटती है। साथ ही फसलों की उपज में 15 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि तथा गुणवत्ता में भी सुधार देखा गया है। धान में विटामिन एवं प्रोटीन की मात्रा बढ़ने जैसे सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं।वैज्ञानिकों ने बताया कि ढैंचा क्षारीय एवं लवणीय भूमि के लिए अत्यंत उपयुक्त हरी खाद फसल है, जबकि सनई शीघ्र गलने वाली कोमल फसल है। मूंग, उड़द, लोबिया तथा ग्वार जैसी दलहनी फसलें भी मृदा में नाइट्रोजन बढ़ाने के लिए उपयोगी हैं। इन फसलों की फलियां तोड़ने के बाद शेष हरे पौधों को भी खाद के रूप में मिट्टी में दबाया जा सकता है।उन्होंने किसानों को बीज की अनुशंसित मात्रा का पालन करने की सलाह दी। इसके अनुसार ढैंचा के लिए 20 से 25 किलोग्राम, मूंग 12 से 15 किलोग्राम, सनई 25 से 30 किलोग्राम, लोबिया 30 से 35 किलोग्राम तथा ग्वार 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त होता है।वैज्ञानिकों ने बताया कि हरी खाद वाली फसलों में सामान्यतः अतिरिक्त खाद की आवश्यकता नहीं होती, हालांकि शुरुआती वृद्धि के लिए आवश्यकता अनुसार पोषक तत्व दिए जा सकते हैं। बुवाई प्रसारण (ब्रॉडकास्टिंग) अथवा कतार विधि से की जा सकती है। आवश्यक सिंचाई के बाद 45 दिन की कोमल अवस्था में फसल को रोटावेटर से मिट्टी में मिलाकर 7 से 10 दिन तक सड़ने दिया जाए। इसके बाद धान की रोपाई, लेही विधि से बुवाई अथवा ड्रम सीडर के माध्यम से कतार बुवाई की जा सकती है। धान की सीधी बुवाई (डीएसआर) अपनाने वाले किसानों के लिए वैज्ञानिकों ने ब्राउन मैन्योरिंग तकनीक को भी उपयोगी बताया। इस पद्धति में धान के साथ 2ः1 अनुपात में ढैंचा बोया जाता है। बाद में ढैंचा को नष्ट कर खेत में ही मल्च के रूप में छोड़ दिया जाता है, जिससे खरपतवार नियंत्रण, नमी संरक्षण और मृदा की उर्वरता बढ़ने के साथ धान की उपज में भी सुधार होता है। कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, रायगढ़ के वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि वे हरी खाद एवं ब्राउन मैन्योरिंग जैसी पर्यावरण अनुकूल तकनीकों को अपनाकर मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाएं, खेती की लागत कम करें तथा दीर्घकालीन टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि की दिशा में आगे बढ़ें। 1232937241764876755885195

हरी खाद से खेत होंगे उपजाऊ, बढे़गी पैदावार और घटेगी खेती की लागतकृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, रायगढ़ के वैज्ञानिकों ने किसानों को दी प्राकृतिक पोषण प्रबंधन अपनाने की सलाहरायगढ़, 8 जुलाई 2026/ कृषि की बढ़ती लागत और मृदा की घटती उर्वरता के बीच हरी खाद किसानों के लिए एक प्रभावी, प्राकृतिक और किफायती विकल्प बनकर उभर रही है। कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, रायगढ़ के प्राध्यापकों एवं वैज्ञानिकों ने किसानों से हरी खाद एवं हरी पत्तियों की खाद का अधिकाधिक उपयोग करने की अपील करते हुए बताया कि इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है तथा फसलों की उत्पादकता और गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होता है। वैज्ञानिकों ने बताया कि हरी खाद के लिए ढैंचा, सनई, मूंग, उड़द, लोबिया एवं ग्वार जैसी दलहनी फसलें बोई जाती हैं। इन फसलों को बुवाई के लगभग 35 से 45 दिन बाद, फूल आने से पहले रोटावेटर अथवा कल्टीवेटर की सहायता से खेत में ही मिट्टी में मिला दिया जाता है। कुछ दिनों में यह सड़कर जैविक खाद का रूप ले लेती हैं, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन, कार्बनिक पदार्थ तथा अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है।इसी प्रकार हरी पत्तियों की खाद के लिए नीम, करंज, ग्लिरिसिडिया एवं सहजन जैसे वृक्षों की कोमल पत्तियों और टहनियों को खेत में मिलाया जाता है। इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता में सुधार होने के साथ लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता भी बढ़ती है। वैज्ञानिकों के अनुसार हरी खाद से प्रति हेक्टेयर लगभग 50 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन की पूर्ति होती है। इससे मिट्टी की संरचना मजबूत होती है, जल धारण क्षमता बढ़ती है, भूमि का कटाव कम होता है तथा पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है। रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होने से खेती की लागत घटती है। साथ ही फसलों की उपज में 15 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि तथा गुणवत्ता में भी सुधार देखा गया है। धान में विटामिन एवं प्रोटीन की मात्रा बढ़ने जैसे सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं।वैज्ञानिकों ने बताया कि ढैंचा क्षारीय एवं लवणीय भूमि के लिए अत्यंत उपयुक्त हरी खाद फसल है, जबकि सनई शीघ्र गलने वाली कोमल फसल है। मूंग, उड़द, लोबिया तथा ग्वार जैसी दलहनी फसलें भी मृदा में नाइट्रोजन बढ़ाने के लिए उपयोगी हैं। इन फसलों की फलियां तोड़ने के बाद शेष हरे पौधों को भी खाद के रूप में मिट्टी में दबाया जा सकता है।उन्होंने किसानों को बीज की अनुशंसित मात्रा का पालन करने की सलाह दी। इसके अनुसार ढैंचा के लिए 20 से 25 किलोग्राम, मूंग 12 से 15 किलोग्राम, सनई 25 से 30 किलोग्राम, लोबिया 30 से 35 किलोग्राम तथा ग्वार 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त होता है।वैज्ञानिकों ने बताया कि हरी खाद वाली फसलों में सामान्यतः अतिरिक्त खाद की आवश्यकता नहीं होती, हालांकि शुरुआती वृद्धि के लिए आवश्यकता अनुसार पोषक तत्व दिए जा सकते हैं। बुवाई प्रसारण (ब्रॉडकास्टिंग) अथवा कतार विधि से की जा सकती है। आवश्यक सिंचाई के बाद 45 दिन की कोमल अवस्था में फसल को रोटावेटर से मिट्टी में मिलाकर 7 से 10 दिन तक सड़ने दिया जाए। इसके बाद धान की रोपाई, लेही विधि से बुवाई अथवा ड्रम सीडर के माध्यम से कतार बुवाई की जा सकती है। धान की सीधी बुवाई (डीएसआर) अपनाने वाले किसानों के लिए वैज्ञानिकों ने ब्राउन मैन्योरिंग तकनीक को भी उपयोगी बताया। इस पद्धति में धान के साथ 2ः1 अनुपात में ढैंचा बोया जाता है। बाद में ढैंचा को नष्ट कर खेत में ही मल्च के रूप में छोड़ दिया जाता है, जिससे खरपतवार नियंत्रण, नमी संरक्षण और मृदा की उर्वरता बढ़ने के साथ धान की उपज में भी सुधार होता है। कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, रायगढ़ के वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि वे हरी खाद एवं ब्राउन मैन्योरिंग जैसी पर्यावरण अनुकूल तकनीकों को अपनाकर मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाएं, खेती की लागत कम करें तथा दीर्घकालीन टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि की दिशा में आगे बढ़ें।

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