सबसे गंभीर सवाल हाल ही में आयोजित ‘आदि कर्मयोगी शिविर’ को लेकर भी उठ रहे हैं। 13 से 15 अगस्त के दौरान जहां शासन की मंशा के अनुरूप ग्रामीण क्षेत्रों में शिविरों के माध्यम से लोगों तक योजनाओं और प्रशासनिक सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया, वहीं चिड़ोडीह में ग्रामीणों का आरोप है कि शिविर महज औपचारिकता बनकर रह गया। आरोप है कि निर्धारित अवधि में प्रभावी जनभागीदारी के बजाय सीमित लोगों की मौजूदगी में कागजी प्रक्रिया पूरी कर दी गई। यदि ग्रामीणों के ये आरोप सही हैं तो यह केवल एक शिविर की औपचारिकता का मामला नहीं, बल्कि शासन की जनकल्याणकारी मंशा के क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्न है।


इधर पंचायत क्षेत्र में निर्माणाधीन एवं पूर्ण बताए जा रहे कार्यों को लेकर भी कई गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। ग्रामीणों द्वारा फर्जी मस्टर रोल, संदिग्ध भुगतान, अधूरे कार्यों को कागजों में पूर्ण दर्शाने तथा सरकारी राशि के कथित दुरुपयोग जैसे आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी, लेकिन यदि दस्तावेजों और जमीन पर मौजूद कार्यों के बीच अंतर पाया जाता है तो मामला बेहद गंभीर हो सकता है।
वहीं मामले का सबसे बड़ा पहलू यह है कि यदि किसी कार्य के नाम पर भुगतान हुआ है तो उसकी वास्तविकता मौके पर आसानी से परखी जा सकती है। मस्टर रोल में दर्ज श्रमिकों से पूछताछ, सामग्री आपूर्ति के बिल-वाउचर की जांच, भुगतान अभिलेखों का मिलान, कार्यस्थल का भौतिक सत्यापन और तकनीकी अधिकारियों की रिपोर्ट, इन सभी दस्तावेजों और तथ्यों को सामने रखकर ही पंचायत में विकास की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
ग्रामीणों के आरोपों में पंचायत सचिव के साथ-साथ संबंधित वेंडरों और तकनीकी सत्यापन व्यवस्था की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यदि जांच में फर्जी बिल, वास्तविकता से परे भुगतान अथवा कागजों में पूर्ण दर्शाए गए अधूरे कार्य सामने आते हैं, तो केवल एक व्यक्ति की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं होगा। भुगतान प्रक्रिया से जुड़े जिम्मेदारों, सामग्री आपूर्ति करने वाले वेंडरों तथा भौतिक सत्यापन करने वाले संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच आवश्यक होगी।
बहरहाल गांववासियों का कहना है, अब चिड़ोडीह में उठ रहे सवालों का जवाब अब केवल मौखिक सफाई से नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेजों और जमीन पर मौजूद वास्तविकता से मिलना चाहिए। आखिर पंचायत में कितना काम हुआ, कितना कागजों में हुआ और कितनी राशि का भुगतान किया गया,इन सवालों का जवाब मस्टर रोल, बिल-वाउचर, कार्यादेश, तकनीकी स्वीकृति, भुगतान अभिलेख और भौतिक सत्यापन से ही सामने आएगा।
फिलहाल चिड़ोडीह पंचायत में ताले के पीछे छिपी व्यवस्था और कागजों में दर्ज विकास ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। अब मामले को लेकर उच्चस्तरीय शिकायत की जावेगी। यदि आरोप निराधार हैं तो जांच से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और यदि दस्तावेजों में गड़बड़ी या सरकारी राशि के दुरुपयोग के प्रमाण मिलते हैं तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई का रास्ता भी साफ होगा। चिड़ोडीह में विकास की कहानी आखिर धरातल पर लिखी गई है या सरकारी कागजों में यह राज अब दस्तावेजों की पड़ताल और निष्पक्ष जांच से ही खुलेगा।
